शनिवार, 3 जून 2017

रिवालसर: श्रद्धा की त्रिवेणी से एस्सपरेसो मैक्यिैटो तक

......आतुर (२1 मई रविवार 2017)

रिवालसर: श्रद्धा की त्रिवेणी से एस्सपरेसो मैक्यिैटो तक


         झील। चारों ओर मध्य पहाडिय़ां। दरख्त, पानी और मंद हवाओं के बीच पल रही तीन संस्कृतियां। श्रद्धा की त्रिवेणी (रिवालसर) की फिजा के कशिशपन में अजब सी रूहानी महक  है। रूचिकर लोगों के लिए अवश्य ही प्राचीन रिवाल गांव के सर यानी सरोवर की परिक्रमा हिंदू, बौध और सिक्ख धर्मों का आध्यात्मिक आभास दिलवाने वाली हो सकती हैं। लेकि न धार्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच मुझ जैसे को कैसे, क्यों, कब और कहां की दंत्त कथााएं पारंपरिक भोजन के बाद एस्सपरेसो मैक्यिैटो (रोस्ट ग्राइंडिड कॉफी विद  ड्राप आफ मिल्क फाम/फ्राद) जैसी एक कड़क काली काफी के शाट के साथ मिल जाए तो क्या कहने रूह को वैसे ही हर तरह का सुकून मिल जाए। बिलकुल ऐसी ही हुआ।





        ..........मंडी के साऊथ वेस्ट की तरफ करीब २५ किमी का सफर थका देने वाला था। सूरज की तपिश आग उगल रही थी। बामुश्किल थके हारे पसीने से लथपथ स्वीटहार्ट केया के साथ करीब डेढ़ बजे रिवालसर पहुंचे। बस खड़ी होने वाले स्थान से दाहिने हाथ  नगर पंचायत रिवालसर के गेट से अंदर की तरफ एंट्री ली। थकान और गर्मी के बीच झील भी धुंधली लगे। मुख्यद्वार के सामने बने हवाबंगलू में ही बैठ गए। साथ ही एक बुद्घिस्ट महोदय ऋगजेन झील के पानी को बड़ी उत्सुकता और ध्यान से देख रहे थे। रिवालसर के बार में थोड़ा बहुत सुना था कि यहां झील है, बाकी कोरे कागज की तरह था। उनके ध्यान को देखकर उत्सुकता हुई पूछा तो बोले मिट्टी के टीले तैरते हुए देख रहा हूं। इसके दर्शन किसी दैविक चमत्कार से कम नहीं।  गुरू पद्मसंभव की पावर रूह ऐसे टीलों पर विराजमान होती है। प्राकृति की यह लीला केवल पुण्य कर्म करने वालों को दिखाई देती है। वहीं हिंदू और सिक्ख धर्म में भी सरकंडों के तैरते हुए दिखने में आस्था जुडी है। यकीन मानिए हमे भी वह दिखे।
    तभी दोपहर बाद रिवालसर बारिश और धुंध के आगोश में लिपट गई। हलकी हलकी ठंड दिमाग और शरीर में स्फूर्ति का संचार करने लगी। उत्सुकता बढ़ी तो महोदय ने बताया कि यहां परिक्रमा करिए। रिवालसर झील के किनारे तीन बौद्ध मठ मोनास्ट्रियां हैं जो निग्मया पंथ से संबंधित हैं। इन मठों में से एक भूटान के लोगों का है। इसके अतिरिक्त भगवान कृष्ण, शिव जी तथा लोमश ऋ षि के मंदिर हैं। बस बेहतरीन मौसम के बीच इस तरह के स्टेशन को करीब से देखने और जानने का मौका मिले तो क्या चाहिए थे। हलकी बारिश के बीच निकल पड़े परिक्रमा करने। 

    परिक्रमा: लक्की था हर संस्कृति के साथ तिब्‍बतीी भोजन को भी चखने का मौका मिला। सबसे पहले त्सो पैमा बौद्ध मठ सामने था। अदभुत गुरू पद्मसंभव की प्रतिमा झील की तरफ समाधी लगाए बैठी थी।


 उसके सामने एक छोटे से फूड ज्वाइंट में  थैंथूक( ट्रैडिशनल डिश फार मांक्स) का स्वाद लिया। सोलन शहर की एक चुनिंदा आंटी की शाप यह सूपी डिश बनाने में माहिर थी और कालाघाट में भी इसका स्वाद चखा था, लेकिन यहां का टेस्ट कुछ अलग ही था।


 

१- बौद्ध संस्कृति

 मठ में झील से जुड़ी बौद्ध संस्कृति से ज्ञात हुआ कि कश्मीर के नरेश राजा इंद्र बोधी के पुत्र त्रिकालदर्शी बोद्ध गुरु पदमसंभव साधना के लिए यहां आए थे। तत्कालीन मंडी नरेश अर्शधर की पुत्री मंधवी उनकी शिष्या बनी और बाद में पत्नी भी उनका अनुसरन करने लगी। तरह तरह की अफवाहों के बीच राजा ने इसे अपमान समझा और पदमसंभव का जला देने का हुक्म जारी किया। रिवालसर में पद्मसंभव को जलाया गया। मगर आग की लपटें चमत्कारिक ढंग से जल रूप में तबदील हो गईं और झील बन गई।जिसका नाम पदम संभव झील हुआ। बौद्ध मतावलंबी रिवालसर को सो-पेमा भी कहते हैं। बताया जाता है कि पद्मसंभव बड़े तांत्रिक व महान शिक्षक रहे। वह तिब्बत में बौध धर्म की स्थापना के लिए यहां से उड़ान भरकर गए। और कहते हैं कि झील में तैरने वाले सरकंडों के ऊपर बैठक वह झील घूमते हैं। जिसके दर्शन पुण्य माने जाते हैं।  गोम्या में पदमसंभव की विशाल मूर्ति है । दो बड़े दीपक जिनमे कई किलो घी समां जाता है।  एक ऐतिहासिक गुफा पड़ोस में है, जिसके अंदर चट्टान बोद्ध लिपि में मंत्र उकेरे गए हैं। दिलचस्प यह है कि भूटान वालों की एक मानेस्टरी यहां है।

 

०२- हिंदू संस्कृति
झील के एक छोर में महर्षि लोमेश का मंदिर सच में अद्भुत है। वहां से झील का नजारा ऐसा है कि मानों स्वर्ग में आ गए हों।हिंदू मान्यता के मुताबिक रिवाल्सर का पुराना नाम हृदयलेश है। कुछ विदों से चर्चा करने पर पता चला  कि स्कंद पुराण के हिमबान खंड के प्रथम, द्वितीय और तृतीय अध्यायों में हृदयलेश का वर्णन लोमेश ऋषि की तपस्थली के रूप में आता है। हृदयलेश यानी झीलों का राजा। दंत्त  कथाओं के मुताबिक लामेश ऋषि जब तपस्य के लिए घूम रहे थे उनकी नजर हृदयलेश यानी रिवालसर झाील पर पड़ी। चारों तरफ झील किनारे हरे भरे पेड़ थे। पानी अत्यंत शुद्ध। अपसरायें जलक्रीड़ाएं कर रही थी। वह अत्यंत प्रभावित हुए। तभी उन्होंने झील के किनारे स्नान किया और आराम करने बैठ गए। लेकिन उन्हें नींद आ गई। नींद में उन्हें भस्म लपेटे, रूद्राक्ष मालाओं के साथ दंपत्ति सपने में दिखी और लोमेश ऋषि से यहां तप करने के लिए कहा। तीन माह तक उन्होंने कठोर तप किया। इंद्रदेव भयभीत हो गए। उन्होंने लामेश ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए कई बाधाएं पैदा की। लेकिन कामयाब नहीं हुए। शिव पार्वती ने तपस्या से प्रसन्न हुए और दोनों झील में नौकयान करने लगे।   लोमेश ऋषि ने सब देखकर शिव स्तुती का पाठ शुरू कर दिया। शिव ने प्रसन्न होकर ऋषि को पर्यन्त जीवित रहने का और मनोबल से वायु में भ्रमण करने का वरदान दिया। जब लोमेश ने भगवान शिव से इस झील का महत्व जानने का प्रयास किया तो भगवान ने कहा कि पार्वती ही इसका महत्व बता सकती है। तभी पार्वती के संवाद के दौरान भगवान विष्णु, ब्रह्मा, इंद्रादि देवता तीर्थराज प्रयाग और पुष्कर जैसी नदियां भी यहां प्रकट हुई और ब्रह्मा, विषणु, गणेश, सूर्य और शिव पार्वती सहित पांचों देवताओं ने भूखंड में निवास कर झील में तैरने लगे तथा यहां पर इन टिल्लों बेड़ों में निवास करने का निश्चय किया। जिस कारण रिवाल्सर को पंचपुरी भी कहते हैं। यह सब जानने के साथ साथ लोगों पूरी चनों और हलवे आदि का प्रशाद भी खिलाया।


सिक्ख धर्म:
्रमंडी के राजा जोगेंद्र सेन द्वारा सन 1930 में रिवालसर गुरुद्वारा बनाया है। इसके पूरे साक्ष्य रिवालसर झील में मिलते हैं।  रिवालसर गरुद्वारा कुछ ऊंचाई पर स्थित है। एक सौ ग्यारह सीढियां चढ कर या फिर संकरी पक्की सड़क से भी वहां पहुंच सकते हैं। गुरूद्वारे में मेहनत से गढे सुंदर पत्थरों का खूबसूरती से प्रयोग किया गया है। जो अंदरूनी कक्ष को सरलता व कलात्मकता भारी भव्यता प्रदान करते है। गुरुद्वारा परिसर काफी खुला है, जिसमे लगभग एक श्रद्धालु एक समय में ठहर सकते हैं। यहां हमेशा ठंडी बयार चलती रहती है। लंगर चौबिस घंटे रहता है। सोचा थोड़ा चख लिया जाए। बिलकुल अमृतसर के गोल्डन टैंपल की तरह का स्वाद। ज्योति मेरी पत्नी अमृतसर से है। उसके घर भी स्वर्ण मंदिर के बिलकुल साथ है। तो वहां अकसर लंगर खाना होता है। ....तो रिवालसर से जुड़ा एक और संधर्भ है, जो कि सिक्ख इतिहास से है।  कहते हैं कि सिखों के दसवें गुरु गोविंदसिंह, हिमाचल प्रवास के दौरान वर्ष 1758 में यहां आए थे। बाईस धाराओं के राजाओं से मिलकर मुगल सम्राट औरंगजेब से टक्कर लेने के बारे में यहां मंत्रणा व युद्ध योजनाएं परवान चढ़ाने पर भी विचार हुआ। गुरु यहां लगभग एक माह रहे। बतातें है कि जब गुरु ने झील की प्रदक्षिणा की, तो पदमसंभव सरकंडों में तैर रहे टीलों पर सवार होकर ने प्रकट होकर गुरु को कार्य पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया।



.........बेशक झील में घास से टीले तैरते देखे जा सकते हैं। सीसू मेला के अवसर पर बोद्ध श्रद्धालु इन पर परना चढाते हैं। यह भी मान्यता है कि जब लामा पूजा करते हैं तो ये बेड़े स्वयं मंदिर की झील के सामने लग जाते हैं। श्रद्धालु इनमे पदम संभव की आत्मा का वास मानते हैं। तो हिंदू धर्म इन टीलों में शिव पार्वती समेत पांच देवताओं का वास मानते हैं और सिक्ख गुरू की आध्यात्मिक ताकत। लेकिन इन टीलों के तैरने में वैज्ञानिक तर्क भी जुड़ा है। प्राकृतिक फ्लोटिंग पौधों की जड़ों या अन्य कार्बनिक पदार्थों मिलकर काई की एक चट्टाई बना लेते हैं। चूंकि पानी गहरा होता है। जड़ें नीचे तक नहीं पहुंचती हैं, इसलिए उलझी जड़े ऑक्सीजन में अपने ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं और जीवंत रहती हैं।
 

एट द एंड:


   अब रिवाल्सर की परिक्रमा मठ, मंदिर और गुरूद्वारा के दर्शन करके पूरी हो चुकी थी। सरकंडों के दर्शन भी हो गए थे। बार बार खाना खाने के बाद अब भगवान से इच्छा थाी कड़क काली काफी और वह भी पूरी हो गई। अंतिम छोर पर मोनेस्टरी के गेट के साथ एक माई टाइप आफ कैफे ईमेहो बेरिस्ता मिला। जिसे एक किन्नौरी युवक ज्ञान अपनी फैमली के साथ चला रहा था। इंटीरियर बिलकुल मेरे टेस्ट का। ईटों की साइड दिवारें, किताबें, शेड्स, रैक छत पर टंगे प्लास्टि के पानी से भरे पारदर्शी बैग और अपार्टमेंंट जैसे हाल के साथ ओपन किचन। जिसमें वेस्टर्न फूड, तरह तरह के स्पाइसेस। डिफरेंट फूड और बेहतरी और आधुनिक काफी मशीन। इसी बीच बारिश काफी तेज हो गई। शाम सात बजे की आखरी बस मंडी के लिए पकडऩी थी। लिहाजा पांच से सात बजे का समय इसी कैफे में बारिश के बीच गुजारा और करीब चार एस्सपरेसो मैक्यिैटो के शाट की तृप्ति के बाद वापसी हुई।

अखिलेश महाजन
















मंगलवार, 2 मई 2017

... yes she knows how to be ahead and different from others.Situation doesn't meant for her. But this time The badge of class perfect is full of emotions anger and tears for her. As again she has to leave one more school and friends. She don't want to tag the badge n questions me why? Once that really hurt me but we know This is a relish kick to pinnacle. And of course we both will enjoy each other company n explore


शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

नेहरू गांधी परिवार की पहली विदेशी बहू शोभा नेहरू


नेहरू गांधी परिवार की पहली विदेशी बहू शोभा नेहरू का १०९ वर्षों का लंबा जीवन जर्मनी, हंगरी आदि यूरोपीय देशों में हिटलर की अराजकता से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक का गवाह रहा। ताउम्र संघर्ष में जीने वाली हौसलों से भरी महिला ने अपनी अंतिम सांसों के लिए जगह चुनी तो कसौली। जिसे वह अपनी पति बीके नेहरू की अंतिम निशानी मानती थी। पांच दिसंबर १९०८ में बुडापेस्ट (हंगरी) में यहूदी परिवार में जन्मी इस शख्सियत ने पहले और द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर की अगुवाई में नाजियों अत्याचार, विध्वंसकता देखी और यहूदियों का कत्लेआम। खौफनाक युग से बचते हुए २० वर्ष की उम्र में जब पढ़ाई के लिए इंग्लैंड पहुंची तो नेहरू गांधी परिवार के बीके नेहरू के साथ प्रेम हुआ औरपरिणयसूत्र में बंधकर वह १९३५ में भारत पहुंची। जहां नेहरू परिवार का हिस्सा बनना उनके लिए गर्व की बात थी लेकिन यहां की संस्कृति झटका देने वाली। इसके बावजूद उन्होंने शादी के बाद भारत में अंग्रेजों की हुकूूमत, स्वतंत्रता, विभाजन, महात्मा गांधी, नेहरू जिनसे आधुनिक भारत को शक्ल मिली, वह सब देखा और उनका हिस्सा बनी। उनके बेटे आदित्य कुमार नेहरू के साथ साथ जीवन के अंतिम क्षणों में शोभा नेहरू की देखभाल करने वाले केयर टेकर संजय और धनी राम इस सब का जिक्र करते हुए कहते हैं कि फेयर व्यू हवेली(जहां शोभा ने अंतिम सांस ली) को अपने पति बीके नेहरू की आखिरी निशानी के रूप में मानती रहीं। जिस सुकून की तलाश में वह भटकती रही, आखिरकार वह सुकून और अपनापन उन्हें कसौली में मिला। जहां उन्होंने बुधवार को सुबह सवा पांच बजे अंतिम सांसे लीं। याद्दाश्त की वह धनी थी। सुबह तड़के उठकर चाय के बाद ब्र्रेकफास्ट और ठीक एक बजे लंच। दो बजे वह सोने चली जाती और चार बजे के बाद वह अक्सर पुराने किस्से सुनाया करती थी कि किस तरह उनका परिवार संघर्ष के साये में जीता रहा। वहीं कई अंतराष्ट्रीय मैग्जिन के कॉलम में भी कसौली से जुड़ी इस शख्सियत का संघर्ष उजागर हुआ।
२०१२ में कसौली में डाला था वोट
वर्ष २०१२ में शोभा नेहरू ने हिमाचल विधानसभा चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग कसौली विधानसभा से किया। उन्हें कसौली से बेपनाह मोहब्बत थी। शोभा नेहरू को फौरी नेहरू भी कहा गया। मीडिया से उन्हें काफी परहेज रहा। लेकिन कुछ कालमिस्टस को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि वाशिंगटन में भारतीय राजदूत की पत्नी के रूप में वह कैनेडीज, जांसंस, किसिंगरस और शक्तिशाली अमेरिकी यहूदी लाबी को करीब से देखा और भारत के आधुनिक आकार को भी। भारत को वह अपने पहला घर मानती हैं। द वीक पत्रिका में कल्लोल भट्टाचार्य द्वारा लिखे गए लेखों में उनके संघर्ष भरे जीवन का भी जिक्र है, जहां से शोभा नेहरू बचकर पहुंची।
आधुनिक भारत में कई जिम्मेदार भूमिका निभाई
एक पत्रिका के मुताबिक उनकी आनंद भवन में उनकी पहली मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। वह गांधिज्म से काफी प्रभावित रहीं। नेहरू के लिए समर्थन का एक बड़ा आधार रहे गांधी ने उन्हें भारत के समृद्ध हस्तशिल्प क्षेत्र के बारे में बताया और अधिक जानने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महात्मा के सिद्धांतों का अनुसरन किया। बापू से जुड़े लम्हें उनकी अद्भुत याद्दाश्त के संग्रह का एक हिस्सा हैं। आजादी के बाद भारत पाक विभाजन के समय उन्हें आपातकालीन समिति का सदस्य बनाया गया। उत्तर भारत से पलायन करने वालों को पाकिस्तान भेजने की जिम्मेवारी भी उस समिति के पास रही। जबकि विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब से दिल्ली आई महिलाओं को कढ़ाई और बुनाई कौशल में स्वावलंबी बनाने के लिए शरणार्थी महिला कल्याण संगठन की स्थापना की। जिसके बाद अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड का जन्म हुआ।

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शिव एक साधारण मनुष्य है। लेकिन उनके कर्म उन्हें देवों के देव महादेव में परिवर्तित करते हैं। वह शिवा हैं। महादेव भी और देवों के देव भी। बुराई का नाश करने वाले। तो कभी कामुक प्रेमी। यही नहीं परम नृतक। खूंखार योद्धा। करिश्माई नेता। सर्व शक्तिमान पर कपटहीन। हाजिर जवाब के साथ गजब की सफूर्ति के समानांतर क्रोध। शिव के इतने रूप बखान करने वाली...मेलूहा के मृत्यंजय.... एक शानादार किताब है। फिक्शन ही सही लेकिन शिव के इतने रूप बारिकी से समझाने वाली गजब की लेखनी। १९०० ईसवी पूर्व में आधुनिक परिवेश की झलक। अरसे से इसे पढऩे से गुरेज कर रहा था। लेकिन जब पढऩा शुरू किया तो सच में अद्भुत। सही है रूखा एवं खुरदुरा तिब्बती प्रवासी शिव ही महानायक है।
1900 ईसवी पूर्व, जिसे आधुनिक भारतीय सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से कह जाने की गलती कर बैठते हैं। उस समय के निवासी उस भूमि को मेलूहा के नाम से पुकारते थे। इस साम्राज्य की स्थापना भारत के सबसे महान सम्राट प्रभु श्रीराम ने कई शताब्दियों पूर्व की थी। एक समय गर्वशील रहे इस साम्राज्य एवं इसके सूर्यवंशी शासकों ने कई संकटों का सामना किया था क्योंकि उनकी प्राथमिक नदी पवित्र सरस्वती शनै:-शनै: सूखती हुई मृतप्राय होती जा रही है। पूर्व दिशा से अर्थात चन्द्रवंशियों के साम्राज्य की ओर से वे अत्यंत ही विध्वंसक आतंकवादी आक्रमणों का सामना कर रहे हैं। चकित कर देने वाली एवं दु:खदायी बात यह प्रतीत होती है कि चन्द्रवंशियों ने उन नागाओं से समझौता कर लिया है जो मानव जाति में जाति बहिष्कृत एवं अशुभ जाति थी, किन्तु उनके पास अद्भुत युद्ध कौशल है। सूर्यवंशियों की आस मात्र एक पौराणिक गाथा पर टिकी है कि जब बुराई एक महाकाय रूप धारण कर लेती है, जब ऐसा प्रतीत होता है कि सब कुछ लुप्त हो चुका है कि आपके शत्रु विजय प्राप्त कर लेंगे, तब एक महानायक अवतरित होगा।Ó वह कोई और नहीं शिव है। यह शिव पर रचना-त्रय की प्रथम पुस्तक है। दूसरी पुस्तक सिक्रेट आफ नागा का इंतजार है। ......आतुर

गुरुवार, 2 मार्च 2017

कल करीब 5 बजे ज्योति ने what's app पर यह फ़ोटो भेजा।

26 May 2015 ·
कल करीब 5 बजे ज्योति ने what's app पर यह फ़ोटो भेजा। केया की बस्ते के बोझ के तले दबी नींद को देखकर मन व्याकुल हो उठा| उसे इस तरह देख बचपन आँखों के सामने था! लेकिन लगा की बस्ते का बोझ उस समय शायद इससे कहीं कम! यादों के बीच अचानक मन माँ से बात करने को हुआ। फ़ोन करके सबसे पहले केया के बारे पूछा। जवाब मिला स्चूल का बर्डन काफी है। केया की डे रूटीन के बारे में जाना तो संन्न रह गया। सुबह 6 बजे उठना 7.30 तक रेडी होकर स्कूल बस पकड़ना और शाम को 4 बजे वापसी। असाइनमेंट्स, होम वर्क, ड्राइंग्स आदि की चिन्ता में 5 बजे बस्ते का खेल शुरू। रात को मुश्किल से काम पूरा होना। नहीं हुआ तो सुबह काम पूरा करने की टेंशन की नींद। छोटी जिंदगी और नन्हे दिमाग पर बस्ते का इतना बोझ एक गहरी खाई की तरह महसूस हुआ। जिसमे ज्ञान का उजाला कम और बर्डन रूपी अँधेरा ज्यादा। यह उम्र खेलने कूदने बचपन में डूबने की है और हमारे बच्चेे कहाँ?
..........मैंने कहा बच्चों को प्रश्न सिखाएं उत्तर नहीं!
पर हमारे सिस्टम में यह कहाँ.....

....डीप कश



30 May 2015 .......डीप कश 

 सि‍ग्रेट  का  पहला कश कब खींचा था याद नहीं। शायद 14/15 साल का रहा हूंगा। कच्ची उम्र में जिस चाव और उत्सुकता से पहली बार जहरीला धुंआ निगला था। यकीन मानिए इतने साल बाद उस धुंए की गुलामी से आजाद होने में जरा भी समय न लगा। बस वही चाव और उत्सुकता मन मे थी, लेकिन इस बार सिग्रेट को पकडऩे की नहीं छोडऩे की।
 एक्टिव स्मोकरज में मिथ है कि धूम्रपान छोडऩा मुश्किल है। कैसे छोड़ सकते हैंं? खाली समय और तनाव में फैगिंग के बिना कैसे रहेंगे? ऐसा कुछ नहीं है। यह बहम है। दृढ़निश्चय से इस जहर को छोडऩे की कोशिश करो। जिंदगी सुंदर और शरीर तंदरूस्त लगने लगेगी। आज  करीब तीन साल  मैने इसी दृढ़निश्चय के साथ बिना नशे के गुजार दिए हैं। शायद मेरी तरह कई होंगे।
.....पर खैर मेरी जिंदगी में सिग्रेट छूटना एक चमत्कार ही है। 12-15 सिग्रेट रोज की डाइट थी। यानी 120-150 रुपए रोजाना खर्चा, ऊपर से सेहत की बैंड। हर रोज रात को सोते समय और सुबह उठते हुए खांसी और मुंह से निकलने वाली सिग्रेट की सडांध कहीं न कहीं मेरी नन्ही बेटी केया लंबे अरसे से महसूस कर रही थी। १६ फरवरी २०११२ को वह चंबा से छुट्टी काटकर सोलन वापिस पहुंची। उसी दौरान मेरी तबीयत भी थोड़ी बिगड़ी रहती थी। मेरी यह हालत वह कुछ अरसे से महसूस कर रही थी। मां के साथ टीवी देखते वक्त वह धुम्रपान के साइड इफेक्ट वाले विज्ञापन भी शायद बडे गौर से देख रही थी। उसी रात पूछने लगी की पापा टीवी में जो दिखाते हैं वह सच है। पूछा क्या? कहा कि टीवी में दिखा रहे थे कि सिग्रेट पीने वालों को कैंसर होता है। जिससे वह मर जाते हैं। आप भी तो पीते हैं अगर आपको यह हुआ तो हम क्या करेंगे। नशा छोडऩे का मन हुआ। तभी सोचा जितनी लिखी है उतनी तो भोगूंगा ही। तो सवाल भी उठा आ बैल मुझे मार यानी मौत को दावत क्यों दे रहा हूं। दिमाग की हवा निकल गई)
(..... कुछ खांसी ऊपर स केया की बातें, संवेदनशील हूं लिहाजा पूरी रात खड़े खड़े काटी। सुबह को बीपी शूट (120-180)! लगा एक साइड लगा सुन्न हो रही है। मरता क्या न करता! सोलन अस्पताल पहुंचा। डा अनुज से मुलाकात हुई और डा साहेब ने पूरे शरीर के टेस्ट लिख डाले। लिपिड के परिणाम तो छलांगे मार रहे थे। काउंसलिंग के दौरान दिमाग में बात बैठ गई। मतलब जीना है तो धुम्रपान छोड़ो। फिर उत्सुकता पैदा हुई कि रोजाना लगभग हर घंटे में एक दंडिका का धुआं अंदर खींचने वाला बिना इसके रह सकता है? बस चाव पैदा हुआ कि नशा छोडऩा है। छह माह के अंदर कम से कम दवाओं के बगैर शरीर तंदरूस्त करना है। साथ ही केया को बिना नशे वाला पापा बनके जो दिखाना था। बस उसी दिन आफिस आया। फिर सिग्रेट पीने का मन हुआ। रोक न सका। सिग्रेट मंगवाया और ठिकाने पर पहुंचकर उसे सुलगा तो लिया लेकिन कश अंदर नहीं ले सका। उस दिन को तीन साल हो चुके हैं और बिल्कुृल नशामुक्त!

डोमिनीक लेपिएर शोषित पीड़ित

31 May 2015 · Solan ·
डोमिनीक लेपिएर शोषित पीड़ित और उपेक्षित आम आदमी की लड़ाई अपनी कलम से लिखने वाले पत्रकार और लेखक हैं, जो पुस्तक रोयलिटी का आधा हिस्सा जन कल्याण में लगते हैं। इंडिया खासकर कलकत्ता में चल रहे विभिन्न कार्यक्रम जीवंत उदाहरण है। A THOUSAND SUNS में उन्होंने अपने विश्व भ्रमण के उन अनुभवों का इसमें बड़ी ही शिद्दत से उल्लेख किया है। शायद जिनसे वह अपनी पुस्तकों की सामग्री जुटाते हुए रूबरू हुए.....
थैंक्स सर HE IS AMAZING WRITER